मैं कोई दिनों से सोच रहा था कि आखिर कुंभ में इतना जनसैलाब क्यों उमड़ रहा है। कुछ ठोस उत्तर नहीं मिल रहा था। जरा आप भी सोचिए न।
कहा जाता है कि कुंभ में सारे पाप धुल जाते हैं। लेकिन वहां जाने वाले हर कोई अपने को धार्मिक बताता है। कई घंटों तक सोचने के बाद मुझे महसूस हुआ कि भले ही लोग ऊपर से दुनिया को बोल दे कि हम निष्पापी है। लेकिन खुद की नजर में पापी ही होता है। और उसे धोने का सुअवसर भी आया है, फिर क्यों न इस पाप को धो लिया जाय। यदि चूक गए तो पाप की गठरी काफी भरी हो जाएगी। फिर नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। कम से कम अब तक के पाप का हिसाब तो कर लिया जाए। बाद में पाप करेंगे, सो देखा जाएगा। कुछ तो गरीबों की सेवा कर, तो कुछ दान कर पाप को धो डालेंगे।
शायद इस मानसिकता की वजह से ही पापी लोगों की संख्या बढ़ रही है। दुनिया में सैकड़ों लोगों की रोज हत्या और बलात्कार जैसे घृणित कुकृत हो रहे हैं। और हो भी क्यों न, पाप धुलने के लिए कुंभ जो लगाया जाता है। फिर और भी कई उपाय है। जैसे गंगा स्नान, गंगा दशहरा, छठ पूजा, मैनी अमावस्या जैसे कई पर्व है। जिसमें आप अपना पाप धो सकते हैं।
अब सवाल उठता है जिसने पाप किया ही नहीं, उन्हें क्या जरूरत पड़ी कि पाप धोने के लिए पापियों के संग कुंभ चल दिए हैं। क्या यह संभव है ? आपने कभी सफेद कपड़े को गंदे और रंगीन कपड़े के साथ धुलाई की है ? मैंने की है। सफेद कपड़ा साफ होने की बजाय और गन्दा हो जाता है। यानि गंदगी से गंदगी नहीं धूल सकती। गंदगी धोने के लिए चाहिए स्वच्छ मानसिकता और स्वच्छ विचार। नेक कर्म। और हम खुद को निष्पापी, चरित्रवान समझते हैं। फिर भी उन दरिंदो, अपराधियों के साथ नदी में डुबकी लगाते है, जिन्होने किसी की हत्या कर दी है। किसी को बलात्कार किया है। दूर कहां जाना। महाकुंभ के भगदड़ में भी सैकड़ों श्रद्धालु मर गए और धर्म के ठेकेदार हर हर महादेव का जयघोष करते हुए उत्सव मना रहे थे।
जरा कल्पना करिए आपके आसपास कोई मरेगा तो क्या ऐसे ही उत्सव मनाएंगे। कभी नहीं। सनातन धर्म में लोगों के मरने और जन्म लेने के बाद भी छूतका लग जाता है। तो फिर कैसे भगवान का भोग लगा होगा। परिजनों के चीत्कार और शव से उठ रहे धुएं के बीच गले से कैसे निवाला उतरा होगा। हद है।
खुद से जानिए पराए दिल का हल। सोचिए जरा उन परिवारों पर क्या गुजरा होगा, जो पुण्य कमाने और पाप धोने के लिए कुंभ में गए थे और घर उनकी अर्थी लौटी। किसी के घर मृतकों का शव भी नहीं पहुंचा होगा। क्या उन बेहाल और लाचार पीड़ितों
की चीत्कार उन महात्माओं तक नहीं पहुंची। और उत्सव मनाते रहे। यह निष्ठुर हृदय वाले किसी की पीड़ा नहीं सुन समझ सकते हैं।
सुना है रामकृष्ण के आसपास किसी की पिटाई हो रही थी, और उनके शरीर पर दाग उग रहे थे। और ये कैसे महात्मा है, जिनके पास लोग मर रहे हैं और कुंभ का उत्सव बढ़ता जा रहा है। और ये सारी तकलीफें केवल गरीब, पिछड़ा और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए हैं। बड़े लगों के लिए तो अलग से व्यवस्था है। वह क्यों सोचे आपके लिए ? खुद ही सोचना होगा। हमें उन पापियों के साथ गंगा स्नान कर खुद गन्दा करना है या नेक कर्म कर खुद को दयावान और रहमदिल इंसान बनना है। हमें मनुवादियों के जाल में फंसना है या उससे उबारना है। हमें कुंभ जाकर पापी होने का सुबूत देना है या समाज को शिक्षित कर सावित्रीबाई फुले, डॉक्टर अम्बेडकर की तरह समाज सुधारक बनाना है। तय हमें ही करना होगा। यदि जाने अनजाने कोई पापा भी हो गया है, तो उसका सुधार अच्छे कर्म और प्राश्चित करने से होगा या गंगा स्नान और पूजा पाठ से। हमें दिमाग पर जोर देना होगा। और देश को ढोंगी और पंखड़ियों से लड़कर संविधान को बचाना होगा। तभी हम और हमारी अगली पीढ़ी सुरक्षित रह पाएगी। अगर हमारी आवाज किन्ही के दिल के कोने में गूंजे तो, उसे लबों पर लाइए। तब वह मेरी नहीं, आपकी आवाज होगी।
(ये लेखक के खुद के विचार है)
पंचदेव कुमार

5 Comments
अति सुन्दर विचार हम लोगो के आत्मा से ही निकलता है.👌🥰
ReplyDeleteपाप तुम करो धोये गंगा,
ReplyDeleteकिसे बेवकूफ बना रहे हो?
खुद को? गंगा को? या दुनियाँ को?
थैंक्स
Deleteमहाकुंभ में किस तरह से पापियों का पाप धुल रहा है ये तो सारी दुनिया अच्छी तरह से देख रही है।बहुत शानदार लेख है सर।
ReplyDeleteजब पाप धुलने के लिए उपाय किए गए है, तो पाप करने में परेशानी क्या ? रुपए कमाएं और खर्च करें।
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