-पंचदेव कुमार
जी तोड़ संघर्ष करते रहे हर दिन.
जेपी आंदोलन में जेल भी गये,
ऐसे थे हमारे डॉ इंदल सिंह नवीन.
समाज के लिए भी खूब दहाड़ते थे,
हर जगह झंडा अपना ही गाड़ते थे.
न हारने का भय था, न दुश्मनों का खौफ,
कुरीतियों को मिटा बढ़ जाते थे हर दिन.
अपनी लेखनी से दुनिया को बता दिया,
कुशवाहा जी का डंका विदेशों में बजा दिया.
विश्व हिंदी सम्मेलन में देश में 47 वां स्थान लाकर,
सीतामढ़ी का नाम राष्ट्रीय पटल पर चमका दिया.
बीमार होने के बाद भी डॉ नवीन हमेशा पढ़ते रहते थे,
जन जन को जगाने के लिए हमेशा कुछ लिखते रहते थे.
भले ही चुनाव में जनता का भरपूर समर्थन नहीं मिला,
फिर भी उसी जोश और हौसलों से उड़ान भरते थे हर दिन.
कल डॉ नवीन बिस्तर पर अंतिम सांस गिन रहे थे,
पास बैठे लोगों की फुसफुसाहट भी सुन रहे थे.
शायद कुछ मित्रों से मिलने को सांसें अटकी थीं,
जाने क्यों मेरी आवाज सुनकर उनकी भुजाएं फड़की थीं.
डॉ नवीन के नयनों से बहते आंसू बता रहे थे,
जीवन की खट्टी मिठी यादें शायद सता रही थी.
बहुत कुछ इतिहास गढ़ने को शेष रह गया होगा,
अपनी कंपकंपाती उनलियों से कुछ ऐसा ही बता रहे थे.
दिल की धड़कनें और लंबी सांसें,
हर किसी को डरा रहीं थीं.
उनकी खैरियत जानने को,
फोन की घंटी घनघना रही थी.
आज की रात जाने कौन सी कयामत लायेगी,
उनकी पत्नी कुर्सी पर बैठी कुछ ऐसा ही बता रही थीं.
आज सुबह समाज का चमकता सितारा टूट गया,
दो कॉलेजों के संस्थापक का साथ पल में छूट गया.
सबों को हमेशा हंसाने वाला शख्स,
जाने क्यों रूठ गया.
जब भी मिलते थे डॉ नवीन,
बजाते रहते थे क्रांति की बीन.
शिक्षा की अलख जगाने को,
वे काम करते रहते थे हर दिन.

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