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कल रात ख्वाबों के झील में

- पंचदेव कुमार 

 कल रात ख्वाबों के झील में
तुम तैरती और नहाती रही
गुलबदन तुम बागों में, प्यार
के गीत गुनगुनाती रही
 
पहाड़ों पर तुम हवाओं में,
जुल्फे यूं लहराती रहीं
सिर से पल्लू सरक गया
और तुम शरमाती रही

परियों की तरह मेरे संग
जन्नत में यूं टहलती रही
जब शाम ढली बागों में
तुम बांहों में सिमटती रही

तेरे दिल की धड़कनें
मिटा रहे थी हर फासले
मेरे होठों से होठ मिले, और
आंखों से आंसू बहने लगे

साथ जीने मरने की कसमें
प्रिय हमने खा तो ली
मगर ये दुनिया देख न सकी
मेरे प्यार को पल में मिटाने लगी
कल रात ख्वाबों के झील में...


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