.पंचदेव कुमार
मैं कली हूं
अभी खिली हूं
ये बगिया महकी है
चिड़ियां भी चहकी है
यहां आने वाले
रोगी भी खुश हैं
तुम भी खुश हो
मैं भी खुश हूं
फिर क्यूं मुझे
तोड़ लेते हो
अपने स्वार्थ में
मुझे बली चढ़ाते हो
दुर्गंध आने पर
नदी में बहाते हो
हद है तुम्हारी पूजा
पहले पानी गंदा करते हो
फिर साफ करते हो
हे महामानव !
केवल इतना बताओ
तुम्हें पत्थर में
ईश्वर दिखता है,
और मुझ में नहीं ?
पर सुना है
ईश्वर तो सब जगह है
फिर मुझमें क्यों नहीं ?
तुम में क्यों नहीं ?
अगर मुझमें इश्वर है
तो कैसे उनका गला
मरोड़ देते हो
पल भर में मुझे
डाली से तोड़ देते हो !
मुझे न तोड़ो
न मुझे मरोड़ो
हो सके तो पानी दे दो
मंदिर पीछे बाड़ी दे दो
हमेशा ईश्वर को
खुशबू से महकाऊंगी
फूल बनकर
प्रभु की राहें सजाऊंगी
झूम झूम कर
उपवन को हँसाउंगी
यही अंतिम विनती करने चली हूँ
मैं भी तुम जैसे ही पली हूँ
मैं कली हूं....
मुझे न तोड़ो
मुझे न तोड़ो।

1 Comments
अति सुंदर कविता
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