हम बेटियां, जब
निकलती हूं घर से
नजरे झुकी होती हैं
उन दरिंदों के डर से
मगर कब तक ?
मगर कब तक मैं डरती रहूंगी
घुट- घुट कर मरती रहूंगी
आज न कल,
हमें खुद हथियार उठाना होगा
झांसी का रूप धरकर
दरिंदों का शीश काट लाना होगा
बहुत हो चुका
अब न सहने वाली हूं
तेरे हाथ-पांव काट कर
आज ही लेने वाली हूं।
चाहे छूप जाओ कहीं भी
हमारी बहनें ढूंढ निकालेगी
चीख उठेगी तुम्हारी भी रूहें
जब तेरी आंखें निकाली जायेगी
फिर गर्दन पर धार चलायेगी
तब शायद हमारी
मृत बहनों की आत्मा को मिलेगी शांति
जब खून के बदले खून बहायेगी
पंचदेव कुमार
18/08/2024
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