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आज ही के दिन

 आज ही के दिन हम 

दो अजनबी मिले थे 

और फूलों की हार 

एक- दूजे के गले में डाले थे 

अग्नि के समक्ष, साथ

जीने मरने की कसमें खाई थी

सात फेरे लगा शादी की रस्में

निभाई थी ।


मेरे आने की आहट 

तुम पहचान जाती थी 

दिल की हर बात

बिन कहे जान जाती थी 

मेरे हर कार्य अच्छे लगते थे 

जो बोल दू, सच्चे लगते थे।


बेटा-बेटी के जन्म पर 

घर का आंगन खुशियों 

से महक उठा 

बच्चों की किलकारियों से 

मन की बगिया चहक उठी।


अब न जाने 

किसकी नजर 

हम पर लगी है,

मेरी हर बात 

जहर-सी लगती है,

प्यार की मार भी 

कहर सी लगता है।


लेकिन, हम दोनों 

अपनी अपनी जगह सही है,

एक-दूजे के लिए प्यार भी वही है।

गलत है, तो मेरी नजरिया, 

छाई है दुखों की बदरिया।


मैं बदल गया, तुम भी बदलो 

एक बार फिर अजनबी बनकर 

अपनी दिल की बात सुनकर 

एक दूजे से गले मिल जाए

खाई थी कसमें हमने जो

साथ मिलकर उसे निभाये।।

      पंचदेव कुमार, 

27 अप्रैल 2024

[11/6/2024, 09:26] 

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