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कुछ मुक्त्तकें


मेरी सफलता से उनको डर लगने लगा है,

हाथों में कलम देख उनका दिल जलने लगा है,

मुझे गिरते देख अफसोस करते थे जो,

मुझसे छोटा कद उनका उन्हें ख़ुद खलने लगा है।


मेरा मकान देख उनको बड़ा लगने लगा है

बदन पर अच्छे कपड़े देख मन भरने लगा है 

मेरे जख्मों पर मरहम लगाते थे जो लोग, 

उनका जमीं तले पांव खिसकने लगा है। 


दुश्मनी की चाल देख मुझे डर लगने लगा है

रहनुमा की साजिश से दिल घबराने लगा है 

अब तो, तारीफ करनेवाले शख्स से भी 

मुझे सपने में भी डर लगने लगा है


आपकी शालीनता और बातें हमें याद रहेंगी

सिखलायी हैं जो चीजें, हमेशा पास रहेंगी

हरदम आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया हमें

नववर्ष की यादें हम सबों के लिए खास रहेंगी

      - पंचदेव कुमार


नाम तेरा मेरे दिल पर लिखा है 

साथ तेरा मेरे जेहन में छिपा है 

भूल जाओ चाहे मुझे तुम शायद

गांव तेरा मेरे नजरों में बसा है

      - पंचदेव कुमार


जीवन की आस में 

खुद की तलाश में 

भटक रहा हूँ मैं 

मन के आकाश में 

         -- पंचदेव कुमार


जिंदगी के सफर में मिलना-जुलना जरूरी है

ढलती उम्र में रोज घूमना-फिरना जरूरी है

बन्द कमरे में बैठे-बैठे भी थक जाते है जब 

बच्चों के संग रोज खेलना- कूदना जरूरी है ।।

                                     - पंचदेव कुमार

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बच्चों की मीठी बोली कितनी अच्छी लगती है

हकलाते-तुतलाते बोलते है, फिर भी अच्छी लगती है

मैं तो ज्ञानी हूँ, पर जाने क्यों

मेरी बोली सबों को कहाँ अच्छी  लगती।


ईश्वर के स्वरूप होते है बच्चे

अपने मन के अनुरूप होते है बच्चे

छल-प्रपंच होती नहीं उनके जेहन में

तभी तो सबों के करीब होते है बच्चे।


हम सब हिंदू एक हैं 

ये बातें कितनी फेंक है

हमने भी पढ़ा है इतिहास 

उसमें तो कहीं न उल्लेख है।



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