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मैं कविता कहां लिख पता

मैं कविता कहां लिख पता 

चाह कर तो और भी नहीं 

अंदर कोई शक्ति है, जो

लिखने को प्रेरित करती है

पता नहीं, क्यों ? 

किसी की व्यथा सुनकर

दिल कांप उठता है।


किसी को भूखे देखकर

आहत हो जाता है,

दिमाग चिन्तन करता है

हृदय मंथन करता है

फिर आंखों के समाने 

तस्वीरें उभर आती है


जन्म देनी वाले मां बाप 

को संतान क्यों सताती है ?

इस चिंतन के बीच 

हाथ भी पीछे नहीं रहता

चट पेन उठाकर पट 

कुछ लिखने लगता है।


मैं साक्षी भाव 

अंतर्मन की बात सुनता रहता हूं

कुछ जोर घटाव करता रहता हूं

सोचता है दिमाग

लिखता है हाथ 

देखता है आंख 

सुनाता है जिव्हा, तालू और ओठ 

तालियां बजाते है श्रोता 

सुनता है कान

तब बढ़ता है मेरा मान 

मै कविता कहां लिख पाता हूं। 


     - पंचदेव कुमार

[26/5/2024, 00:43]

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