जिन्होंने मेरा जीवन
रंगों से संवार दिया
खुद झेली मुसीबत, पर
मुझे खुशियों का बाहर दिया ।
मैं खेतो में हल-बैल
चला रहा था
जीवन की गाड़ी
सरपट दौरा रहा था।
एक दिन
मैं अपने भाग्य विधाता से
टकरा गया
एक ही झटके में मैं
पत्रकारिता करने आ गया।
मुझे न लिखने आता था
न पढ़ने,
आता था बस
देखा-देखी बाते दुहराने।
गलतियां करता गया
फिर सुधारता गया
मान तो कभी अपमान
झेलता गया
जीवन के नए अनुभव सीखता गया
कामयाबी के एक-एक सीढी
चढ़ता गया
हर कदम पर सच्चे इंसान का साथ मिलता गया।
-पंचदेव कुमार
0 Comments