मैं पानी हूं
सूखे कंठ की
वाणी हूं
बरसात में
पानी पानी हूं
मैं वाष्प बनकर
उरता हूं
फिर बदल बनकर
बरसता हूं ।
मैं ओस की बूंद हूं
झरने की गूंज हूं
नदी की धार हूं, और
वीरों की वार हूं।
मैं फसलों को सींचता हूं
लगी आग को बुझाता हूं
फिर क्यों बेवजह
मुझे बर्बाद कर रहे हो
पूछो, क्या तुम
खुद को आबाद कर रहे हो ?
मैं पृथ्वी पर जीवन हूं
विकास का विजन हूं
मुझ बिन ये भूमि
रेगिस्तान हो जायेगी
सुख जायेंगे पेड़-पौधे
दुनिया वीरान हो जायेगी।
देखो न
भू-जलस्तर गिर रहा है
तापमान बढ़ रहा है।
गर्मी और ठंडी में रहना
अब दुश्वार हो रहा है।
नदियों का
दोहन हो रहा है, और
बालू माफियाओं का
पोषण हो रहा है।
बालू खनन से
नदियां सूख रही हैं
बंजर हो रही भूमि
अब सांसे भी टूट रही है।
मैं पानी हूं
सूखे कंठ की
वाणी हूं
मुझे बचाओ लो
ये बात सभी दो।
फिर कहता हूं,
मैं पानी हूं,
सूखे कंठ की
वाणी हूं।
-पंचदेव कुमार
13/4/2024, 12:01
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