कंधे पर झोला लेकर
माता पिता को शीश नवाकर
हम दोस्तों के संग
रोज स्कूल जाते थे
जमीन पर दरी बिछाकर
पढ़ते थे और गीत गाते थे
क्लास में रूम में
न बिजली थी न पंखे थे
गर्मी में काॅपी को झेलते थे
घंटी बजते ही
बहार आ जाते थे
टिफिन के समय
कबड्डी भी खेलते थे
गुरु जी की छारी देख
कांप जाते थे
टास्क याद नहीं रहने पर
बहाना बना घर रह जाते थे ।
जब चाहे घर जाकर
दोस्तों के संग खाते थे
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
कहते थे, आपस में है भाई भाई
जमाने के साथ
सब कुछ बदल गया
जिम्मेदारियों की बोझ तले
बचपन भी निगल गया
. पंचदेव कुमार
14/4/2024, 13:33
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